कार्पोरेटी हिंदुत्व लोकतांत्रिक भारत की हत्या कर रहा है, लोकतंत्र को लाठीतंत्र में बदल रहा है

Spread the love

शैली स्मृति व्याख्यान में बोले संजय पराते : मोदी मतलब मर्डर ऑफ डेमोक्रेटिक इंडिया

कार्पोरेटी हिंदुत्व लोकतांत्रिक भारत की हत्या कर रहा है, लोकतंत्र को लाठीतंत्र में बदल रहा है

वर्तमान मंथन डेस्क :-

“कार्पोरेटी हिंदुत्व लोकतांत्रिक भारत की हत्या कर रहा है। संवैधानिक मूल्यों को ध्वस्त किया जा रहा है। असहमति रखने वाले व्यक्तियों और संगठनों को फासीवादी औजारों से खामोश किया जा रहा है, समाज के लोकतांत्रिक माहौल – डेमोक्रेटिक स्पेस – को ख़त्म किया जा रहा है।” यह बात संजय पराते ने 19वें शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यानमाला में बोलते हुए कही।  उन्होंने कहा कि जो भी जायज बात रखता है या उठाता है, उसे नक्सल या पाकिस्तानी करार देकर निशाने पर ले लिया जा रहा है और जेलों में डाला जा रहा है। बस्तर में आम तौर पर सलवा जुड़ूम अभियान के दौरान आदिवासियों पर हुए अत्याचार और विशेष रूप से सारकेगुड़ा और हाल ही में सिलगेर में हुए जन संहार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासियों के लिए न्याय पाना अंतहीन प्रतीक्षा का मामला बन गया है, जो किसी भी सभ्य समाज और लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी तरह सरगुजा में आदिवासियों ने संविधान की मुख्य बातों को पत्थर पर उकेर कर शिलालेख बनाये थे, जिसे भाजपा के राज में तोड़ने का अभियान चलाया गया था। अब छत्तीसगढ़ के नौजवान संविधान में लिखी बातों को पोस्टर की तरह हाथ में लेकर जलूस निकालते हैं और अपने संवैधानिक अधिकारों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।

उक्त विचार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के पाक्षिक लोकजतनद्वारा फेसबुक पर आयोजित एक व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। यह व्याख्यानमाला मप्र माकपा के पूर्व सचिव शैलेन्द्र शैली की स्मृति में हर वर्ष 24 जुलाई से 7 अगस्त तक आयोजित किया जाता है। इस वैचारिक आयोजन के 7वें दिन “बस्तर से सरगुजा तक : स्थगित संविधान, निलंबित लोकतंत्र” विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की दो-तिहाई से आबादी गरीबी रेखा के नीचे बसर करती है। खाद्य सुरक्षा, मनरेगा और न जाने किन-किन मामलों में देश भर में अव्वल प्रदेश होने का दावा करने वाले छग में भूख से मौतों की घटनाएं इन दावों की सचाई बयान करती हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की बुरी हालत के चलते एक ओर जहां कोरोना में सरकारी दावे से कई गुनी मौतें हुयी, वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों ने जमकर लूट मचाई और एक एक मरीज से लाखों वसूले। खुद सरकार द्वारा तय की गयी दरें भी अनाप-शनाप हैं।

मोदी शब्द की व्याख्या मर्डर ऑफ डेमोक्रेटिक इंडिया के रूप में करते हुए संजय पराते ने कहा कि सरकारें चाहें भाजपा की हों या कांग्रेस की, कारपोरेट की लूट के रास्ते आसान करने और उसके लिए लोकतंत्र को लाठीतंत्र में बदलने के लिए दोनों ही तत्पर हैं। इसके खिलाफ यदि आदिवासी आवाज उठाते है, तो सिलगेर जैसे काण्ड करके उन्हें गोलियों से भून दिया जाता है। असली सवालों को हल करने के बजाय वे दोनों राम वन पथ गमन को ढूंढने के लिए करोड़ो रूपये फूंक रहे हैं और गाँव-गाँव में रामायण बंटवाकर और जबरिया उसका पाठ करवा कर,

आदिवासियों की संस्कृति नष्ट कर उन्हें हिन्दू बनाने पर तुले हैं।  गाय के बहाने दलितों पर और धर्मांतरण के बहाने ईसाइयों पर हमले बढ़े हैं। बुनियादी समस्या या मांगों को उठाने पर उन्हें सुधा भारद्वाज की तरह जेल में डाले रखना या स्टेन स्वामी की तरह सांस्थानिक हत्या का शिकार बनाना आम रवैया है। बोधघाट परियोजना का उदाहरण देते हुए पराते ने कहा कि असली इरादा किसी भी तरह कारपोरेट के मुनाफे बढ़ाने का है। जंगलों के विनाश पर सहज आक्रोश व्यक्त करने पर आदिवासी दमन का शिकार बनाये जा रहे हैं। असली लड़ाई इस शुद्ध तानाशाही से है।

संजय पराते ने कहा कि उदारीकरण के दौर में, आजादी के बाद की चिंतन प्रणाली को सबसे पहले नष्ट किया गया।  कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ने रोजी-रोटी छीनने और आदिवासी गरिमा को कुचलने का रास्ता अख्तियार किया है। सलवा जुडूम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस निर्णय में कहा गया था कि “क्या सत्ताधारी नीति निर्माता भारत के संविधान से संचालित हो रहे हैं?” इसका जवाब “नहीं”में देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि “यह विकास आतंकवाद है। यह वैश्वीकरण की लागत गरीबों पर थोपकर इसका फ़ायदा कार्पोरेट्स को पहुंचाना है। प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर, उन पर कारपोरेट का कब्जा कराकर दरबारी पूँजीवाद के लिए आदिवासियों की बलि ली जा रही है।”

माकपा नेता ने आदिवासियों को सभ्य बनाने के दावे को धूर्तता बताते हुए कहा कि सभ्यता का कोई एक पैमाना नहीं हो सकता — संस्कृतियों को नष्ट कर एक तरह की संस्कृति थोपकर तथाकथित एकरूपी सभ्यता नहीं गढ़ी जा सकता।

अभी तक दस हजार से ज्यादा लोग उनका व्याख्यान सुन चुके हैं। उन्होंने अपने इस व्याख्यान को प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और दिवंगत स्टेन स्वामी को समर्पित किया है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति वर्तमान मंथन (VM News) उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार वर्तमान मंथन (VM News) के नहीं हैं, तथा वर्तमान मंथन VM News उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है. 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.