डेढ़ महीने में ही 2000 रुपये प्रति क्विंटल तक कम हो गया सरसों का दाम

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सरसों के सबसे बड़े उत्पादक प्रदेश राजस्थान में इसका रेट पिछले डेढ़ महीने में ही करीब 2000 रुपये प्रति क्विंटल कम हो गया है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि दाम में यह नरमी कुछ समय के लिए है, इसलिए किसानों को इसे बेचने में जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिए. नवंबर में राजस्थान में 9000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास का रेट था लेकिन, अब यह घटकर 6800 से 7100 रुपये तक रह गया है. हालांकि, रेट अब भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से ऊपर ही है. इस समय एमएसपी 5,050 रुपये प्रति क्विंटल है.

साल 2021 में सरसों की रिकॉर्ड कीमत (Mustard Price) रही है. शुरू से ही तिलहन में तेजी रही है. सरसों के तेल का भाव 250 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया था. अपने देश में तिलहन फसलों की मांग उत्पादन के मुकाबले काफी अधिक है. ऐसे में कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सरसों का दाम एमएसपी से ऊपर ही रहेगा. सरसों की नई फसल आने में अभी करीब तीन महीने का वक्त है. ऐसे में इसके दाम में उतार-चढ़ाव हो सकता है. खाद्य तेलों में सरसों का योगदान करीब 28 फीसदी है.

कहां कितना है दाम?

>>राजस्थान की मालपुरा मंडी में 19 दिसंबर को सरसों का मॉडल प्राइस और अधिकतम रेट 7,175 रुपये प्रति क्विंटल रहा.
>>राजस्थान की बांदीकुई मंडी में 19 दिसंबर को सरसों का मॉडल प्राइस 6,875 रुपये प्रति क्विंटल जबकि अधिकतम दाम 7,100 रुपये प्रति क्विंटल रहा.
>>हरियाणा में सरसों का रेट राजस्थान के मुकाबले बेहतर रहा. यहां की हिसार मंडी में न्यूनतम दाम 8,195, मॉडल प्राइस 8,200 एवं अधिकतम 8,210 रुपये प्रति क्विंटल रहा.
>>मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 19 दिसंबर को सरसों का अधिकतम दाम 7,365 रुपये प्रति क्विंटल रहा.

सरसों की फसल क्यों है लाभदायक?

भारत खाद्य तेलों (Edible Oils) के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर है. सालाना यहां करीब 70 हजार करोड़ रुपये का खाद्य तेल इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से मंगाया जाता है. इसलिए अब सरकार सरसों और दूसरी तिलहनी फसलों को बढ़ावा देने के लिए मिशन मोड पर काम कर रही है. मार्केट में जानकारों का कहना है कि जब तक खाद्य तेलों का आयात होता रहेगा तब तक सरसों का दाम एमएसपी से ऊपर ही बना रह सकता है. इसलिए इसका उत्पादन किसानों के लिए फायदेमंद है.

मांग और आपूर्ति में कितना है अंतर?

जनसंख्या वृद्धि की वजह से उत्पादन की तुलना में खाद्य तेलों की हमारी घरेलू मांग में वृद्धि हो रही है. भारत में खाद्य तेलों की घरेलू मांग लगभग 250 लाख टन है, जबकि उत्पादन केवल 111.6 लाख टन ही हो रहा है. यानी मांग और आपूर्ति में लगभग 56 फीसदी का अंतर है.

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