खेतिहर समाज संकट की जकड़ में : डॉ. अशोक ढवले

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खेतिहर समाज संकट की जकड़ में : डॉ. अशोक ढवले

VM News desk Durg :-

अखिल भारतीय किसान सभा देश का सबसे बड़ा किसान संगठन है तथा पिछले तीन दशकों में पूरे देश में किसान आंदोलन के विस्तार में उसका अभूतपूर्व योगदान है। डॉ. अशोक ढवले किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा आज वे संयुक्त किसान मोर्चा के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। भारत के किसानों को सशक्त करने तथा ग्रामीण गरीबों के अधिकारों के लिए वे अनथक संघर्ष कर रहे हैं। उनके पास भारतीय कृषि क्षेत्र का गहरा ज्ञान तथा आर्थिक सुधारों के बाद पैदा संकट की गहरी समझ है। ढवले का कहना है कि जब तक यह लड़ाई जीती नहीं जाती, तब तक संयुक्त किसान मोर्चा का दिल्ली की सीमाओं पर धरना जारी रहेगा। वे यह भी कहते हैं कि किसान समुदाय ही है, जो खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करते हैं और जब तक इस बुनियादी जरूरत को हमारा शासक वर्ग नहीं समझता, देश का भविष्य अंधकारमय है।

अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइनके लिये अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष अशोक ढवले से अनुपमा कतकाम द्वारा लिया गया साक्षात्कार का हिंदी में रूपांतरण

 प्रश्न देश की दो-तिहाई आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को इस ओर केंद्रित करने और इस क्षेत्र को सकारात्मक ढंग से प्रभावित करने के बजाए, भारत धीरे-धीरे कृषि संकट में फंस गया है और आज तक फंसा हुआ है। इस पर आपकी टिप्पणी?

डॉ अशोक ढवले  – यह तथ्य कि आजादी के 75 सालों के बाद भी दो-तिहाई भारतीय आबादी कृषि पर निर्भर है, अपने आप में इस बात का संकेत है कि भारतीय कृषि संकट में है। आर्थिक उदारीकरण की नीतियां भारतीय अर्थव्यवस्था के ढांचागत रूपांतरण में असफल साबित हुई है। कृषि क्षेत्र के कमजोर विकास के कारण आधे से ज्यादा खेतिहर परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे हैं। ग्रामीण मांग में स्थायी गिरावट आई है और ग्रामीण क्षेत्रों में क्रय शक्ति में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसके नतीजे में, औद्योगिक विकास दर भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रहा है।

केरल, प. बंगाल और त्रिपुरा के बाहर कृषि सुधारों के पूर्ण अभाव और ग्रामीण अधोसंरचना में सार्वजनिक निवेश के दयनीय स्तर के कारण भारतीय कृषि ऐतिहासिक संकट के दौर से गुजर रही है। नतीजा, भारत में ग्रामीण असमानता विश्व में सबसे ऊंचे स्तर पर है। ग्रामीण समाज में जब तक ऐसे अंतर्विरोध मौजूद रहेंगे, संकट खत्म नहीं होगा और 1991 के बाद से कृषि समाज इसी संकट से जकड़ा हुआ है। कृषि के विकास दर में गिरावट आई है। सार्वजनिक निवेश गिर रहा है। कृषि अनुदान में कटौती हुई है और इससे खेती-किसानी की लागत बढ़ी है।

मुक्त व्यापार समझौते के कारण प्रमुख चीजों का आयात बढ़ा है, जिसके कारण कई मालों की कीमतें गिरी हैं। इसी तरह, फसलों की लाभ-दरों में गिरावट आई है। कृषि ऋणों को सीमांत और छोटे किसानों से विमुख करके बड़े तबकों और कृषि व्यापार करने वाले कॉर्पोरेट घरानों की ओर मोड़ दिया गया है। हम आज जो कृषि संकट देख रहे हैं, वह वास्तव में पिछले तीन दशकों से जारी नव उदारवादी नीतियों का नतीजा है। किसान सभा ने इसका पूर्वानुमान कर लिया था और इन नीतियों के लागू होने के एक साल के अंदर ही इसके दुष्परिणामों के खिलाफ 1992 में हरियाणा के हिसार में हुए अपने राष्ट्रीय सम्मेलन में चेतावनी दे दी थी।

प्रश्न – सुधार असफल क्यों हुए?

आर्थिक विकास के बावजूद, भारतीय कृषि ने कोई तेज प्रगति नहीं की?

 न ही ग्रामीण विकास तेज हुआ और न ही छोटे किसान संकटमुक्त हुए। ऐसा क्यों?

डॉ अशोक ढवले –  कृषि के क्षेत्र में सुधार असफल हुए, क्योंकि उन्होंने इस क्षेत्र की जरूरतों को गलत ढंग से समझा। कृषि क्षेत्र में सुधारों के लिए ज्यादा सार्वजनिक निवेश की जरूरत थी। लेकिन हमारे नीति-निर्धारकों का मानना था कि यदि कृषि में घरेलू और बाहरी बाजार खोल दिये जायें, तो यह क्षेत्र अपने-आप प्रगति कर लेगा। अब आप पश्चिमी जगत की ओर देखिए। पश्चिमी कृषि एक साल भी जिंदा नहीं रह पाएगी, यदि उनके बाजार उस तरीके से खोल दिये जायें, जैसा हमने भारत में खोला है। यही कारण है कि पश्चिम में एक मजबूत संरक्षणवादी नीतियां लागू हैं और जिसे उन्होंने विश्व व्यापार संगठन की समझौता वार्ताओं में हटाने से इंकार कर दिया था। यह हास्यास्पद है कि एक ओर तो वे अपनी कृषि को संरक्षण दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे भारत पर अपने दरवाजे खोलने के लिए दबाव डाल रहे हैं। यह दोहरा मानदंड है, लेकिन हमारी सरकार इस गैर-तार्किक मांग के आगे भी पूरी तरह से झुक रही है।

कम उत्पादकता

कृषि के क्षेत्र में उत्पादकता कम है। यह क्षेत्र बढ़ती हुई श्रम शक्ति को भी अपने में खपाने में असफल है। कृषि सुधार नाकामयाब हुए हैं। किसान और विशेषकर छोटे किसान आज पहले से भी ज्यादा हाशिये पर है। क्या आप इसके कारण बता सकते है?

 कृषि में कम उत्पादकता एक गंभीर समस्या है। किसान सभा का मानना है कि उत्पादन में वृद्धि के इतने दयनीय स्तर पर रहने के का एक बड़ा कारण यह है कि सार्वजनिक कृषि शोध को कमजोर किया गया है। हमें अपनी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम-से-कम दो प्रतिशत सार्वजनिक कृषि क्षेत्र में निवेश करना होगा। चीन ने भी यही किया था।

चीन ने अपने देश से मोंसैंटो को भगाया और सार्वजनिक कृषि शोध में अपने को मजबूत किया और अधिक उत्पादकता वाले ऐसे बीजों का उत्पादन किया, जिनका मूल्य मोंसैंटो की कीमत का लगभग चौथाई ही था। वहां शोध को ऐसी मजबूती मिली ज्यादा सार्वजनिक निवेश से। ऐसा करने में हम यहां असफल हैं, क्योंकि यहां हम मोंसैंटो और अन्य कॉर्पोरेट घरानों के दास हैं। इसी तरह, कृषि क्षेत्र में हमारा विस्तार पूरी तरह से गैर-सरकारी संगठनों और निजी व्यापारियों की दया पर निर्भर है। यदि सार्वजनिक शोध को कमजोर किया जाएगा, तो सार्वजनिक विस्तार की प्रक्रिया भी ढह जाएगी।

मुक्त व्यापार के खतरे

अर्थशास्त्री लगातार आगाह कर रहे है कि मुक्त व्यापार से और सार्वजनिक खर्च में कटौती से हमारे देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

 मुक्त व्यापार की प्रणाली को पूरी दुनिया में नकारा जा रहा है। यहां तक कि विकसित देश भी विश्व व्यापार संगठन को विश्वसनीय संस्था के रूप में नहीं देखते। यही कारण है कि वे ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों की ओर बढ़ रहे हैं। यदि विश्व व्यापार संगठन सक्रिय और उपयोगी होता, तो आपको ऐसे नए समझौतों की जरूरत क्यों पड़ती? अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कृषि समाज में इन मुक्त व्यापार समझौतों ने खौफ पैदा किया है। सस्ते आयातों के पहाड़ वहां जमा हो चुके हैं। कीमतों में भारी गिरावट आई है। कृषि संकट और गहरा हुआ है।

मुक्त व्यापार ने उन देशों की खाद्य सुरक्षा पर भी असर डाला है और खाद्यान्न उत्पादन गिरा है। वे नगद फसल निर्यात करने पर जोर दे रहे हैं और अनाज खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा हासिल करना चाहते हैं। लेकिन नगद फसलों के भाव गिर रहे हैं और इसलिए निर्यात से कमाई में भी गिरावट आ रही है और वे पहले की तरह ही खाद्यान्न आयात में भारी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। इससे उनकी खाद्यान्न सुरक्षा प्रभावित हो रही है।

इसी के साथ, सार्वजनिक खर्च में जो भारी कटौती हो रही है, उसने लघु और सीमांत किसानों की लाभ के साथ उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है। अनुदान में कटौती और कॉर्पोरेट मुनाफे के कारण इनपुट (आदान) मूल्यों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। किसानों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता बढ़ रही है। यह सब लघु और सीमांत किसानों की मुश्किलों को बढ़ा रहा है।

प्रश्न क्या आप इस बात से सहमत हैं कि भारत की विकास दर और ज्यादा तेज होगी, यदि कृषि क्षेत्र के विकास के लिए सुधारों को लागू किया जाता है?

डॉ अशोक ढवले –  यह एक साधारण तथ्य है कि 1980 के दशक में भारत में कृषि विकास की दर पिछले 30 सालों की तुलना में, जिस दौर में नवउदारवादी नीतियों को लागू किया गया, ज्यादा थी। यह संकेतक इस सच्चाई को बताने के लिए पर्याप्त है कि इन सुधारों से कृषि क्षेत्र में किसी भी प्रकार के विकास को प्राप्त करने में हम कामयाब नहीं हुए हैं।

लेकिन यहां दूसरा विषय है। नरेंद्र मोदी सरकार का कहना है कि इन सुधारों के कारण 2015 से 2022 के बीच कृषि आय दुगुनी हो जाएगी। यह वर्तमान भाजपा सरकार की सबसे बड़ी असफलता है। वास्तविकता यह है कि किसानों की आय में इस बीच वास्तविक मूल्य पर गिरावट ही आई है। घातक और विवेकहीन विमुद्रीकरण, अविचारपूर्ण जीएसटी प्रणाली, कोरोना संकट के दौरान अमानवीय तरीके से थोपी गई तालाबंदी … इस सबसे किसानों को बहुत नुकसान पहुंचा है। वे काफी गुस्से में है। वे महसूस करते हैं कि इन सुधारों ने उनकी जिंदगी को और बदतर बनाया है।

किसान आंदोलन का विकास

प्रश्न – आप पिछले 30 सालों से किसानों के आंदोलन और उनके संघर्षों के नेतृत्व कर रहे हैं। इस अभियान का केंद्रीय मुद्दा क्या है और किसानों की इस लामबंदी को आप किस तरह देखते हैं?

 डॉ अशोक ढवले  – पिछले 30 सालों से इस देश में जो नवउदारवादी नीतियां इस देश में लागू की जा रही हैं, उसने गहरे कृषि संकट को जन्म दिया है और इसके कारण 1995 से अब तक पिछले 25 सालों में 4 लाख से ज्यादा किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी है। मैं इसे इस दौर के किसान आंदोलन का केंद्रीय विषय मानता हूं।

तीन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के मौलिक मुद्दे के साथ ही अन्य विषय हैं : स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार उत्पादन के समग्र लागत (सी-2) का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय कानून बनाना ; बिजली संशोधन विधेयक को वापस लिया जाना, जिसके कारण पूरे बिजली क्षेत्र का निजीकरण होगा और इससे सभी उपभोक्ताओं के बिलों में भारी वृद्धि होगी ; डीज़ल, पेट्रोल और गैस के दामों को आधा करना ; किसानों और खेत मजदूरों की संपूर्ण कर्ज़ मुक्ति (वर्तमान केंद्र सरकार ने पिछले सात सालों में कॉरपोरेटों के लाखों करोड़ रुपयों के कर्ज को माफ किया है।) ; संकटग्रस्त किसानों की मदद के लिए फसल बीमा योजना में पूरी तरह से सुधार (क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों को मदद मिलने की बजाए बीमा कंपनियों को ही मुनाफा होता है) ; सभी लघु और सीमांत किसानों को सस्ते दरों पर उनकी आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त कर्ज़ मिले ; महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत काम करने वाले सभी कृषि मजदूरों के लिए मजदूरी और काम के दिन दुगुने हो ; आदिवासी किसानों के लिए वनाधिकार कानून का सख्त क्रियान्वयन ; किसानों की भूमि के जबरन अधिग्रहण पर रोक लगाओ ; आदि। यह आंदोलन सही तरीके से भूमि सुधार की भी मांग कर रहा है। इन मांगों के साथ ही चार श्रम संहिताओं को वापस लेने की मजदूर वर्ग की मांग और भाजपा सरकार द्वारा देश की संपत्तियों के निजीकरण और उसे बेचने की मुहिम पर रोक लगाने की आम जनता की मांग भी इस व्यापक किसान आंदोलन के केंद्रीय विषयों में शामिल हैं।

नव उदारवादी नीतियों के पिछले 30 सालों में इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द किसान आंदोलन का विकास हुआ। लेकिन मोदी सरकार के पिछले सात सालों में, जब कॉर्पोरेट-पक्षधर नीतियों को लागू किया गया, किसान आंदोलन और तेज हुआ। किसानों की ओर से इन नीतियों का तीखा प्रतिरोध हुआ, जैसा कि हमने राजस्थान और महाराष्ट्र के व्यापक किसान संघर्षों में देखा, जिनमें वर्ष 2017 की किसानों की 11-दिवसीय हड़ताल और किसान सभा के नेतृत्व में वर्ष 2018 का किसान लांग मार्च भी शामिल था।

इसके बाद वर्ष 2018 में राष्ट्रीय राजधानी में दो विशाल रैलियां हुई : एक अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) द्वारा और दूसरी सीटू-किसान सभा-खेत मजदूर यूनियन द्वारा।

 दिल्ली की सीमाओं पर और पूरे देश में संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के नेतृत्व में चलाया जा रहा यह ऐतिहासिक किसान संघर्ष ऐसे सभी पिछले संघर्षों के उत्कर्ष है। यह आंदोलन 26 नवम्बर, 2020 को शुरू हुआ था और इसने 9 महीने पूरे कर लिए हैं। केंद्र सरकार द्वारा जो तीन काले कृषि कानून थोपे गए, वे ताबूत पर अंतिम कील साबित हुए हैं। किसानों के इस संघर्ष ने धर्म, जाति, क्षेत्र, राज्य और भाषा की दीवारों को तोड़ दिया। इस संघर्ष ने बहादुरी के साथ दमन का मुकाबला किया है। इस आंदोलन ने कॉर्पोरेट, सांप्रदायिकता और नवउदारवाद के त्रिशूल पर अपना निशाना साधा है। किसानों का यह दृढ़ निश्चय है कि जब तक जीत नहीं मिलती, तब तक वे अपने आंदोलन को व्यापक और घनीभूत करेंगे।

ठेका खेती

प्रश्न ठेका खेती एक बड़ा मुद्दा है। हालांकि इसे बढ़ावा दिया जा रहा है, इसके नतीजे भिन्न-भिन्न है। क्या आप ठेका खेती के लाभ और कमियों को समझाएंगे?

 डॉ अशोक ढवले  – कुछ समय के लिए हम अपने देश में ठेका खेती कर चुके हैं। हमारा मानना है कि ठेका खेती के लिए एक अच्छे और किसान-पक्षधर कानून की जरूरत है। हमें इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि सहमति के मूल्य को अदा न कर कॉर्पोरेट कंपनियां किसानों के साथ कोई धोखाधड़ी न करने पाए। हमें इस बात को सुनिश्चित करने की जरूरत है कि ये कंपनियां पर्यावरणिक रूप से खतरनाक कृषि व्यवहार हमारे किसानों पर न थोप पाएं। विवाद की स्थिति में हम चाहते हैं कि शिकायत निवारण प्रणाली किसानों के पक्ष में काम करने वाली हो।

लेकिन इसके बजाय हम देख रहे हैं कि इन कृषि कानूनों को इस प्रकार सूत्रबद्ध किया गया है कि ये ठेका खेती करने वाली कंपनियों को ही मदद करती है। किसानों में यह डर समा गया है कि ये कंपनियां उनसे उनकी जमीन छीन लेगी। इसलिए हम ठेका खेती पर कड़ा नियमन चाहते हैं। इन नियमनों को राज्य सरकारें अपने प्रदेश की विशेष स्थितियों के मद्देनजर सूत्रबद्ध करके उन्हें पारित करा सकती हैं।

प्रश्न इन नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन में अखिल भारतीय किसान सभा सक्रियता से हिस्सा ले रही है। क्या आप इन कृषि कानूनों के बारे में बताएंगे?

डॉ अशोक ढवले –  ये कृषि कानून भारतीय किसानों की आजीविका पर एक बड़ा हमला है। 1960 के दशक से ही किसानों और उपभोक्ताओं को कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) की मंडियों और आवश्यक वस्तु कानून (ईसीए) का संरक्षण मिलता रहा है। कृषि उपज मंडियों की व्यवस्था में कुछ गड़बड़ियां होने के बावजूद इसके जरिये किसानों को बाजार तक पहुंचने में मदद मिली और कीमतों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिली। जरूरत इन गड़बड़ियों को दूर करने की थी।

इसकी जगह सरकार ने ये कृषि कानून बनाये। इसका सीधा अर्थ है कि वे कृषि उपज मंडियों की व्यवस्था नहीं चाहते तथा इसे ध्वस्त करना चाहते हैं और इसका नियंत्रण अडानी और अंबानी जैसे निजी कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में सौंपना चाहते हैं। मंडियों की व्यवस्था का खात्मा किसानों को इन कॉरपोरेटों के चंगुल में फंसा देगा। इससे पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में किसान आत्महत्याओं में वृद्धि होगी। 2006 में बिहार में मंडी व्यवस्था को खत्म करने का किसानों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ा है।

इसी तरह, आवश्यक वस्तु कानून में संशोधन से रिटेल और लॉजिस्टिक क्षेत्र पर कॉरपोरेटों द्वारा कब्जा करना आसान हो जाएगा। इसका अर्थ है कि उपभोक्ताओं के लिए भी बाजार में खाद्यान्न वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि होगी।

संक्षिप्त में, भाजपा राज के ये तीन कृषि कानून न्यूनतम समर्थन मूल्य और अनाज की सरकारी खरीद की प्रणाली को ध्वस्त करते हैं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखते है, जिसका लाभ अभी तक भारत की 81 करोड़ से ज्यादा जनता उठा रही है। यही कारण है कि हमारा मानना है कि ये कृषि कानून न केवल किसान विरोधी हैं, बल्कि वास्तविक अर्थों में जन विरोधी भी हैं।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ये कृषि कानून असंवैधानिक भी हैं। कृषि का क्षेत्र राज्य सरकारों के नियंत्रण में हैं, लेकिन कई अन्य विषयों की तरह ही केंद्र सरकार ने इस मामले में भी संविधान की भावना का पूरी तरह से अनादर किया है, संघीय सिद्धांतों का उल्लंघन किया है और राज्य के अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए इन कानूनों को संसद में पारित किया है। संसद में वामपंथी और अन्य पार्टियों के सांसदों ने इसका कड़ा विरोध किया था, लेकिन ये कानून तानाशाहीपूर्ण तरीके से देश पर थोप दिए गए है।

हमारी मांग साफ है। हम चाहते है कि ये तीनों कानून वापस लिए जाएं। पिछले 9 महीनों से चल रहा किसान आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक कि यह मांग पूरी नहीं होती

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