कृपा शब्द का अर्थ क्या होता है, आइये जानते है इसके बारे में

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कृपा शब्द का अर्थ क्या होता है, आइये जानते है इसके बारे में –

वर्तमान मंथन/बालोद : कृपा  शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है ,  “कृ” और “पा” अर्थात कृ का मतलब करो और पा का मतलब पाओ, चार वेदों छह शास्त्रों में भी यही बात लिखी और कहीं गई है, कि जैसा करोगे वैसा पाओगे जैसे कि किसी मनुष्य को सुख देंगे तो सुख प्राप्त होगा और दुख देंगे तो दुख प्राप्त होगा इसीलिए अपने कर्मों को उसी प्रकार बनाये कि आपके कर्म कभी आपको दुख ना दें l

आगे सत्संग परिचर्चा में बालमुकुंद जी ने बहुत ही सुंदर विचार प्रस्तुत किए की. “एक शरणागत भक्त को प्रार्थना के लिये प्रयास नहीं करना पडता, उसकी प्रत्येक क्रिया प्रार्थना ही बन जाती है।

इसलिए स्वभाव बनाओ की भगवान ही अपना लगे …”

इस पर बाबा जी ने विचार रखते हुए कहा कि शरणागत के लिए यह संभव इसलिए हो पाता है क्योंकि वह अपने प्रियतम को पूर्ण समर्पित होता है और जो इस तरह से समर्पित होता है उसके लिए भगवान की भक्ति के लिए कोई साधन की आवश्यकता नहीं होती उसका हर कण हर क्षण प्रत्येक अंग ही उसका साधन होता है

गिरधर सोनवानी  जी ने मन की गति को नियंत्रित किस प्रकार की जाती है इस पर विचार व्यक्त करने की विनती की इस पर अपने भाव व्यक्त करते हैं बाबा जी ने बताया कि मन आपका है वह किसी का नहीं हो सकता वह किसी के साथ बांटा नहीं जा सकता इस को नियंत्रित करने का केवल साधन बताया जा सकता है उसे दिशा निर्देश दिया जा सकता है पथ प्रदर्शक बना जा सकता है परंतु नियंत्रण केवल आप ही कर सकते हैं इसके लिए हमारे कर्मों का प्रभाव सात्विक होता है जैसे

हमारा आहार-विहार होगा हमारा मन उसी प्रकार होगा इसीलिए सात्विकता अपनाईये एवं धार्मिक जीवन को अपनाइये आपका मन स्वयं नियंत्रित हो जाएगा

प्रतिदिन की भांति ऑनलाइन सत्संग का आयोजन सीता रसोई संचालन वाट्सएप ग्रुप में प्रातः 10:00 से 11:00 दोपहर 1:00 से 2:00 बजे बालोद जिला के महान तीर्थ श्री पाटेश्वर धाम के संत राम बालक दास जी के द्वारा किया जा रहा है जिसमें सभी भक्तगण जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते हैं