मणिकर्णिका घाट से जुड़ी मान्यताएं जनते हैं आप

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VM NEWS DESK C.G:– कार्तिक पूर्णिमा का पर्व इस वर्ष 19 नवबंर दिन शुक्रवार को मनाया जा रहा है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को देव दिवाली के नाम से जाना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार बैकुंठ चतुर्दशी तथा पूर्णिमा के दिन मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने का विधान है। धार्मिक शास्त्रों में इस घाट का क्या महत्व है, इस बारे में लोग बहुत कम जानते हैं, तो आइए कार्तिस पूर्णिमा के इस शुभ उपलक्ष्य पर जानते हैं कि मणिकर्णिका घाट से जुड़ी खास जानकारी-

धार्मिक शास्त्रों में किए वर्णन के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन घाट पर स्नान करने वाले जातक को अपने जीवन के पापों से मुक्ति मिल जाती है। बता दें मणिकर्णिका घाट काशी में स्थित हैं। माना जाता है कार्तिक मास में इसके स्नान का सर्वाधिक महत्व होता है।

बताया जाता है कि काशी में गंगा नदी तट पर स्थित यह असल में एक श्मशान घाट है, जिसे तीर्थ माना जाता है। ऐसी मान्यताएं हैं कि यहां की चिता की आग कभी शांत नहीं होती। प्रत्येक दिन यहां 300 से भी अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। लोक मत है कि यहां अंतिम संस्कार होने वाला प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त होता है।

इस घाट पर विशेष रूप से चैत्र नवरात्री की अष्टमी के दिन वैश्याओं का विशेष नृत्य का कार्यक्रम होता है। इसके बारे में मत है क ऐसा करने से उन्हें इस तरह के जीवन से मुक्ति मिलती है।

इसके अतिरिक्त मणिकर्णिका घाट पर प्रत्येक वर्ष फाल्गुन माह की एकादशी के दिन चिता की राख से होली खेली जाती है। माना जाता है कि इस दिन शिव के रूप विश्वनाथन बाबा, अपनी पत्नी पार्वती जी का गौना कराकर अपने देश लौटे थे। जब इनकी डोली यहां से गुजरती है तो सभी अघोरी बाबा लोग नाच गाने, रंगों से इनका स्वागत करते हैं।

कहा जाता है कि यहां पर माता सती के कान के कुंडल गिरे थे, जिसका प्रमाण है यहां स्थापित शक्तिपीठ है। इसी कारण के चलते इसे मणिकर्णिका के नाम से जाना जाता है।

प्रचलित पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय भगवान शिव हज़ारों वर्षों से योग निंद्रा में थे, तब विष्णु जी ने अपने चक्र से एक कुंड बनाया, जहां भगवान शिव ने तपस्या से उठने के बाद स्नान किया था और उस स्थान पर उनके एक कान का कुंडल खो गया, जिसके बारे में कहा जाता है कि वो आज तक नहीं मिला। ऐसा माना जाता है कि तब ही से इस कुंड का नाम मणिकर्णिका घाट पड़ गया। काशी खंड में वर्णन है कि मणिकर्णिका घाट गंगा अवतरण से पहले भी अस्तित्व में है।

अन्य प्रचलित धार्मिक कथाओं के अनुसार मणिकर्णिका घाट पर भगवान विष्णु ने सबसे पहले स्नान किया। इसीलिए वैकुंठ चौदस की रात के तीसरे प्रहर यहां पर स्नान करने से मुक्ति प्राप्त होती है। तो वहीं यहां पर विष्णु जी ने शिव जी की तपस्या करने के बाद एक कुंड बनाया था।

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