ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से होते हैं श्रेष्ठ – रामबालकदास जी

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ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से होते हैं श्रेष्ठ – रामबालकदास जी

वर्तमान मंथन/बालोद : हमारे धर्मशास्त्रों में ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थिति प्रदान की गयी है। इनको भूसुर अर्थात् धरती का देवता कहा गया है। सात्विक गुणों की प्रधानता के कारण ब्राह्मण अपने सद्ज्ञान से सारे समाज का पथ प्रदर्शक बनता है। सारा जगत देवों के अधीन है देवता मंत्रों के अधीन हैं। उन मंत्रों के प्रयोग, उच्चारण व रहस्य विप्र भलीभाति जानते हैं इसलिये ब्राह्मण देवतुल्य होते हैं।

बाबा रामबालकदास जी ने कहा कि मनुष्य जन्म से ब्राह्मण नहीं होता जब वह ब्राह्मणत्व का आचरण करता है दिव्य गुणों को धारण करता है तब ब्राह्मण बनता है। यज्ञ करना, यज्ञ कराना, वेद पढ़ना, वेद पढ़ाना, दान लेना, दान देना ये ब्राह्मण के षट्कर्म हैं। लोग सन्मार्ग पर चलें, सुसंस्कार अपनायें इसके लिये ब्राह्मण दूसरों की अपेक्षा अधिक त्यागी, तपस्वी, संयमी रहकर अपना व्यक्तित्व श्रद्धास्पद बनाता है। यजुर्वेद में कहा गया है ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख के समान होता है। उत्तम ज्ञान प्राप्त कर मुख से इसका विस्तार करता है। जिस प्रकार मुख में जो कुछ डाला जाता है उसे मुख अपने पास न रखकर आगे बढ़ा देता है ऐसी ही भूमिका ब्राह्मण की होती है। वेदव्यास ने कहा है चौपायों में गौ उत्तम, धातुओं में सोना उत्तम, शब्दों में वेदमंत्र उत्तम और दो पायों में ब्राह्मण उत्तम हैं। बाबा जी ने कहा ब्राह्मण समाज के मस्तिष्क हैं ज्ञान के भण्डार। अपने कर्म, आचरण से श्रेष्ठ हैं इसलिये समाज में इन्हें सर्वाधिक महत्व प्राप्त है। ब्राह्मण रूपी मस्तक के कट जाने पर शरीर रूपी समाज की मानसिक, आध्यात्मिक, धार्मिक और नैतिक मृत्यु हो जाती है।

बाबा जी ने कहा ब्रह्मवैवर्तपुराण में ब्राह्मण का महत्व बताते हुये कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा, तीर्थों में पुष्कर, पुरियों में काशी, ज्ञानियों में शंकर, शास्त्रों में वेद, वृक्षों में पीपल सर्वश्रेष्ठ है उसी प्रकार जातियों में ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। समस्त पुण्य तीर्थ और व्रत ब्राह्मण के चरणों में निवास करते हैं। ब्राह्मण की चरणरज शुद्ध तथा पाप और रोग का विनाश करने वाली होती है। इनका आशीर्वाद सारे कल्याण का कारक होता है। जहा ब्राह्मण का तिरस्कार होता है वहा से सुख शांति चली जाती है। जहाॅ इनका अपमान होता है वहा कोई तेजस्वी और वीर नहीं होता। यहा ब्राह्मण शब्द जाति विशेष के अर्थ में नहीं अपितु मन की अवस्था विशेष वाले व्यक्तियों के अर्थ में प्रयोग किया गया है।

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